Moving forward and facing adversities, A story of Basheero from Dedasari Village, Bap Block.

संघर्ष के साथ बढते कदम....
 
बशीरो देदासरी गांव की रहने वाली है। यह सरल स्वभाव की है। बशीरो की उम्र 18 वर्ष है। यह 9वीं कक्षा में अपने गांव में ही पढ़ती है। फलोदी से करीब 80 किलोमीटर दूर बशीरो की ढाणी है। देदासरी गांव में मुस्लिम परिवार ज्यादा रहते हैं बशीरो ने एक मुस्लिम परिवार में जन्म लिया। माता का नाम अमीनत और पिता का नाम सद्धीक खां है। बशीरो के दो भाई, 2 बहिने है। 5 भाई-बहिन में बशीरो का दूसरा स्थान है।
 
जुड़ाव से पूर्व की स्थिति: दूसरा दशक से जुड़ने से पूर्व बशीरो स्कूल बहुत ही कम गई। मदरसा भी कभी-कभी जाती थी। बशीरो नषा भी करती थी और साफ-सफाई पर कोई ध्यान नहीं देती थी। बशीरो दातुन नहीं करती थी। बशीरो कहती है कि सप्ताह में एक या दो बार नहाती थी। दिनभर एक-दूसरे के घर आती-जाती रहती और मस्ती करती थी।
 
जुड़ाव: दूसरा दशक से बशीरो का जुड़ाव 2009 में सात दिवसीय जीवन कौशल प्रशिक्षण से हुआ। इस प्रशिक्षण में संधान से दो साथियों ने संदर्भ व्यक्ति के रूप में भाग लिया था। बशीरो ने जीवन जीने के कौशलों को समझा। प्रशिक्षण के दौरान बशीरो बहुत कम बोलती थी। पहली बार सात दिन के लिए घर छोड़कर फलोदी में सभी जाति की लड़कियों के साथ रही। बशीरो भेदभाव भी बहुत ज्यादा करती थी। नषा भी छिप-छिपकर करती थी।
 
प्रशिक्षण के शुरूआत में बशीरो का बिलकुल भी मन नहीं लगा था। धीरे-धीरे दिनभर की गतिविधियों में शामिल हुई, जिससे उसका मन लगने लगा और प्रशिक्षण पूर्ण करके ही घर गई। गतिविधियों में भागीदारी: बशीरो ने दूसरा दशक की विभिन्न गतिविधियों में भाग लिया-
 
 युवा शक्ति संगठनों के प्रशिक्षण (तीन)
 जीवन कौशल प्रशिक्षण (दो)
 कैमरा सीखे प्रशिक्षण
 बाल मेला
 एसएमसी प्रशिक्षण
 जयपुर भ्रमण
 काडर प्रशिक्षण
 अधिकार व मुद्दा आधारित प्रशिक्षण
 दो विज्ञान मेले
 युवा नेता सम्मेलन
 लोक अधिकार यात्रा
 
युवा मंच से जुड़ाव: बशीरो 2011 में ‘प्रयास’ युवा मंच की सदस्य बनी। मंच के सदस्यों के साथ गांव में स्कूल परिसर, शौचालय, पानी की टंकी आदि की साफ-सफाई की। बच्चों के नाखून काटने का काम भी किया। पीने के पानी को साफ करने का कार्य भी किया। जिसमें सभी साथी मिलकर घर-घर जाकर पानी के टांकों में लाल दवा डालने का कार्य किया।
 
टीकाकरण: बशीरो ने अपने गांव में टीकाकरण करवाने का बहुत प्रयास किया। मुस्लिम बाहुल्य क्षेत्र होने के कारण गांव में कोई भी टीकाकरण नहीं करवाते थे। बशीरो ने नर्स बहन जी (सुश्री शर्मिला) के साथ गांव में भ्रमण कर लोगों को जागरूक किया। गर्भवती महिलाओं व बच्चों को गांव की स्कूल में बुलाकर नर्स बहनजी से टीके लगवाने का कार्य किया। शुरूआत में बहुत कम महिलाएं टीकाकरण करवाती थी लेकिन अब गांव में महिलाएं धीरे-धीरे जागरूक हो रही है। बशीरो हमेषा टीकाकरण में अपना सहयोग देती है। समस्याएं: बशीरो को दूसरा दशक की गतिविधियों से जुड़ने के दौरान कई समस्याओं का सामना करना पड़ा।
 
युवा मंच के साथियों के साथ मिलकर शौचालय की साफ-सफाई करने के दौरान बड़े-बुजुर्गों की बहुत डांट खाने को मिली, लेकिन हमने हिम्मत नहीं हारी।
 
पहली बार सात दिवसीय प्रशिक्षण के बाद गांव में गई तो अड़ौस-पड़ौस के लोगों ने मेरे माता-पिता को बहुत बुरा कहा वो मुझे बिल्कुल अच्छा नहीं लगा।
 
लोक अधिकार यात्रा के दौरान कालू खां की ढाणी में बशीरो अपना अनुभव सुनाने के लिए सभा में खड़ी हुई तो वहां के कुछ लोागों ने कहा कि ‘एक मुस्लिम लड़की हमें क्या समझाएगी’। लोगों की यह बात बशीरो ने अनसुनी करते हुए अपनी बात को जारी रखा और मुस्लिम लड़कियों को पढाने व आगे बढाने की बात कही।
 
इखवेलो: बशीरो ने दूसरा दशक द्वारा संचालित देदासरी गांव में इखवेलो संचालन का कार्य भी समय-समय पर किया। जिसमें बच्चों को खेल करवाना, पुस्तकें वितरण करना, गीत सीखाना, चित्र बनवाना, कागज की टोपी बनाना आदि कार्य किए। इखवेलो पर होने वाली विभिन्न गतिविधियों में भी प्रभारी को सहयोग देती थी।
 
बदलाव: बशीरो का आत्मविष्वास बढा एवं अभिव्यक्ति में निखार आया है।
 मुद्दों पर समझ के साथ अपनी बात को कहना सीखा।
 खुद ने नषा छोड़ा अब दूसरों को नषा छोड़ने के लिए प्रेरित कर रही है।
 स्वयं सफाई से रहती है और परिवार व अन्य लोगों को इसके लिए जागरूक करती है।
 
परिणाम: बशीरो के स्कूल के अध्यापक स्कूल में होने वाले कार्यक्रमों जैसे – गणतंत्र दिवस, स्वतंत्रता दिवस आदि समारोह की तैयारियों की रूपरेखा बनाने के लिए बशीरो के साथ चर्चा कर निर्णय लेते है।

जीवन कौशल प्रशिक्षण का असर: बशीरो ने दूसरे जीवन कौशल प्रशिक्षण में माहवारी के बारे में जो जानकारी प्राप्त की उसने अपने गांव में जाकर सबसे पहले अपनी बहिन व मां को विस्तार से समझाया। इसके बाद नर्स बहन जी को साथ लेकर गांव की महिलाओं एवं किशोंरियों को माहवारी के बारे में बताया कि हमें रोज नहाना चाहिए। माहवारी के दौरान साफ व सूती कपड़े का उपयोग लेना चाहिए। कपड़े को साफ धोकर धूप में सुखाना चाहिए। बशीरो कहती है कि हमारे गांव की महिलाओं में यह डर बैठ गया है कि महावारी के दौरान नहाने से बीमार पड़ जाते है और बच्चे नहीं होने की संभावना हो सकती है लेकिन बशीरो ने सभी को समझाया कि माहवारी के समय नहीं नहाने पर कई प्रकार की बीमारियां हो सकती है इसलिए हमें इस दौरान प्रतिदिन नहाना चाहिए। बशीरो के समझाने के बाद अड़ौस-पड़ौस व परिवार में यह बदलाव आया है।
 
अनुभव: प्रशिक्षण के दौरान बशीरो फलोदी में लटियाल माता के मंदिर गई। जिसमें सभी जाति की किशोंरियां साथ में थी। लेकिन मुझे मुस्लिम होने के कारण बाहर गेट पर ही खड़ा कर दिया और अंदर नहीं जाने दिया।
 
‘‘हिन्दू मंदिर में मुझे नहीं जाने दिया इससे मुझे बहुत बुरा लगा’’ ऐसा मुझे पहली बार एहसास हुआ। पहले कभी मुझे ऐसा बुरा नहीं लगता और न ही मंदिर जाने की इच्छा होती थी। जयपुर भ्रमण के दौरान सभी लड़कियों के साथ में जयपुर में ‘बिड़ला मंदिर’ में गई। तथा गहराई से सभी चीजों को देखा व समझा। मुझे बहुत अच्छा लगा अब मुझे किसी भी मंदिर में आने व जाने में कोई झिझक नहीं है।
 
बशीरो युवा नेता सम्मेलन में युवाओं नेताओं व किषोर-किषोरियों के सामने माईक पर भाषण दिया व सवाल-जवाब किए। इस दौरान मालमसिंह की सिड्ड से आई नई लड़की (निकिता) ने बशीरो को डांट लगाई और कहा कि बाहर से आए इतने लोगों के सामने तुम्हें माईक पर नहीं बोलना चाहिए। एक लड़की होने के नाते शर्म आनी चाहिए। बशीरो ने उसकी बात सुनकर सहज भाव से लिया बुरा नहीं माना। बशीरो ने निकिता को समझाया कि हम लड़कियों को पीछे नहीं रहना हैं वैसे भी हमेशा घर वाले, समाज वाले लड़कियों को पीछे ही रखते है। हमें यहां पर अवसर मिल रहा हैं अपनी बात कहने का तो हम जरूर अपने मन की बात को कहे। बशीरो की बात सुनकर निकिता ने भी माईक पर दो शब्द कहे। बशीरो को बहुत अच्छा लगा।
 
सपना: दूसरा दशक से जुड़ने के बाद बशीरो के मन में कई प्रकार की बातें घर कर गई है। वह कहती है जिस तरह मैंने दूसरा दशक से जुड़कर अपनी पढाई को नियमित किया है उसी तरह हमारे गांव में भी मुस्लिम किषोरियां पढे और आगे बढे। सभी लड़कियों को पढने के लिए प्रोत्साहित कर सकूं। मेरे गांव में जैसी मेरी पहचान बनी है मैं चाहती हूं कि सभी लड़कियों की मेरे जैसी पहचान बनें। (बशीरो का एक सपना यह भी है मैं एक दूसरा दशक की कार्यकर्ता के रूप में कार्य करूं क्योंकि इसमें सीखने, सीखाने के अवसर अधिक है।)